Tuesday, 11 August 2015

Dusk and Dawn...

In  crimson hue
For  moments few
When twilight yearns
For a night anew
When the violet sky
Heaves up a sigh 
And meets the land fertile
Listen to the song 
Of the downing sun
His burning was futile

Tomorrow again
In wind and rain
He will peep through dark
Dense clouds in vain
For moments worth
He will touch the earth
A drooping flower will smile
Listen to the song
Of the rising sun
He'll fight again for a while  

Monday, 10 August 2015

Closer To You....

In cobwebbed world
Entangled I am 
Can't you see the pain
Where is the promise 
That you'll draw me near
I wait at your shore in vain

To your gentle breeze
I stand and plead
They let  me come along
And yet your waves 
Push me back again
To the world I don't belong

Have seen enough
The ways of world
Seen the games they play
Been away for far too long
To my home
Show me the way

You beat in my heart
You flow in my tears
You are the air I breathe
Then why have you left
Of  your care's bereft
The sky and I beneath 

In the dampened piles 
Of flesh and blood
How long the heart will bear
Closer to you 
Is where I belong
Why don't you take me there



Thursday, 6 August 2015

हर पल अभिमन्यू मरता है ...

अनजान है तू इस शहर से कुछ 
जो व्याकुल हो यूँ घूम रहा 
संग्दिलों के तंग दिलों  में 
तू घर अपना ढूंढ रहा 

कई बार बताया था तुझको 
कुछ अपनी राह बदलने को 
इन टेढ़ी -मेढ़ी सड़कों पर 
कुछ टेढ़ा-मेढ़ा चलने को 

बात सुनी न तूने तब 
अपने मन में मशगूल रहा 
सोच लिया मन निर्मल है 
पर दुनिया को तू  भूल गया 

भूल गया कोई मोल नहीं  है 
यहाँ तेरे जज़्बातों का 
तेरा अक्स यहाँ है सिर्फ मलिन 
प्रतिबिम्ब किसी की आँखों का 

जब बिखरेगी मन की माला 
न होगा तार पिरोने को 
तब अपमानित मन  बोलेगा 
अपनी फ़ितरत पर रोने को 

आज मिला विष-दंश तुझे 
तो  क्यों फरियादें करता है 
है नर-सर्पों  का चक्रव्यूह 
हर  पल अभिमन्यू मरता  है 

Wednesday, 5 August 2015

मधुबन की आस लिए ....

बरसों बीत गए है तुझको 
मुक्त पवन में साँस लिए 
तूने महल बनाया पत्थर का 
मन में मधुबन  की आस लिए 
है याद तुझे वो दिन जब तूने  
गीत नया कोई गाया था 
यूँ लगा  था तुझको  साथ तेरे 
किसी और ने भी दोहराया था 
आज कहाँ संगीत है वो 
वो साज़ कहाँ जो अपना था 
आँखें कहती  है साथ तेरे 
पर मन कहता वो सपना था 
राख लिए उस सपने की 
तू दूर कहाँ तक जाएगा 
मुढ़कर पीछे जब  देखेगा 
खुद को ही बिखरा पायेगा 
है  किसे खबर जीवन पथ पर 
तुझे भय लगता है मुढ़ने में 
किसको  पता तुझे दर्द  है होता 
टूट के फिर से जुड़ने  में 
तेरी बोझिल आँखें  कहती है 
अब सपना देख न पाएगा 
रिक्त मगर अनुरागों से भी  
तुझसे रहा न जाएगा
है यूँही जटिल  ये जीवन कुछ
नहीं आएगा तुझे  रास प्रिये 
तूने महल बनाया पत्थर का 
मन में मधुबन की आस लिए 

Monday, 3 August 2015

कृष्ण कहाँ से लाओगे ..

फिर भरी एक राज सभा में 
चीर-हरण करवाओगे 
हर आँख में दुःशाशन  है मन 
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे 
वो बात युगों पहले की थी 
जब  तुम पर आँख उठाई थी 
दे अपनी छाती का  लहू 
उसने  कीमत चुकाई थी 
आज अलग  दुनिया है कुछ 
तुम अब नहीं बच पाओगे 
हर आँख में दुःशाशन  है मन 
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे 
वो कालिख लेकर हाथों में 
रोज़ तुम्ही पर फेकेंगे 
ये दृष्टिवान् ध्रितराष्ट्र  सभी  
भर आँख तमाशा देखेंगे 
सदियों पहले के किस्से को 
तुम कैसे अब दोहराओगे 
हर आँख में दुःशाशन  है मन 
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे 
तड़प  लो चाहे  कितना  भी 
वो तरस कभी ना खाएंगे 
निज-कुत्सितता की अग्नि से 
हर रोज़ तुम्हे जलाएंगे 
व्यर्थ अनल में जाएगा 
तुम जितना नीर बहाओगे 
हर आँख में दुःशाशन  है मन 
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे 
ये महाभारत इस युग की है 
जहाँ कंस ध्वजा लहराएंगे 
लाख  दुहाई दोगे तुम 
पर मधुसूदन नहीं आएंगे 
इस ह्रदय-हीन  सभा में कैसे  
अपनी लाज बचाओगे 
हर आँख में दुःशाशन  है मन 
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे 






अधूरी निशानी ...

कभी जज़्बात की आँधी 
कभी हसरत की बरसातें 
मन को जूझना होगा 
कि है निर्मम यहाँ रातें 
किसी के पास सब  कुछ  है 
कोई हर पल तरसता है 
कहीं आँखों में सपने है 
कहीं सावन बरसता है 
कोई तो रास्ता होगा 
जहाँ से वक़्त गुज़रता हो 
होगा कोई गाँव ऐसा 
जहाँ कुछ पल ठहरता हो 
ये नदी है जीवन की 
है  इसकी धार में बहना 
बह जाओ तो बेघर हो 
वर्ना प्यासे  रहना 
न कोई चाह है फिर भी 
बड़ी तीखी उदासी है 
जो नींदों से जगाता हो 
ये कैसी बदहवासी  है 
नहीं है ख़्वाब  ये कोई 
ये मेरी ही कहानी है 
एक अधूरे मन की ये 
अधूरी सी निशानी है 

मन का घरौंदा...

उड़ा लो अपने बादल को 
मुझे धूप झुलसता सहने दो 
मेरा मन का घरौंदा है काफी 
मुझे अपनी धुन में रहने दो 
गूंजती है दीवारों में 
हर दर्द के आहट की कंपन 
हर साँस ठहर सी जाती है 
जब नींव में होता  है स्पंदन 
है रुष्ट अगर घर मुझसे  तो 
उसे यूँ उखड़ा ही रहने दो 
मेरा मन का घरौंदा है काफी 
मुझे अपनी धुन में रहने दो 
इस निर्धन मन का ग्रास  यही 
दो आँखें  पूरा करती है 
है विचित्र यह गागर जो 
बस चक्षुजल से भरती है 
है अश्रु नहीं ये जीवन है 
जो बहता है तो बहने दो 
मेरा मन का घरौंदा है काफी 
मुझे अपनी धुन में रहने दो