अनजान है तू इस शहर से कुछ
जो व्याकुल हो यूँ घूम रहा
संग्दिलों के तंग दिलों में
तू घर अपना ढूंढ रहा
कई बार बताया था तुझको
कुछ अपनी राह बदलने को
इन टेढ़ी -मेढ़ी सड़कों पर
कुछ टेढ़ा-मेढ़ा चलने को
बात सुनी न तूने तब
अपने मन में मशगूल रहा
सोच लिया मन निर्मल है
पर दुनिया को तू भूल गया
भूल गया कोई मोल नहीं है
यहाँ तेरे जज़्बातों का
तेरा अक्स यहाँ है सिर्फ मलिन
प्रतिबिम्ब किसी की आँखों का
जब बिखरेगी मन की माला
न होगा तार पिरोने को
तब अपमानित मन बोलेगा
अपनी फ़ितरत पर रोने को
आज मिला विष-दंश तुझे
तो क्यों फरियादें करता है
है नर-सर्पों का चक्रव्यूह
हर पल अभिमन्यू मरता है
बरसों बीत गए है तुझको
मुक्त पवन में साँस लिए
तूने महल बनाया पत्थर का
मन में मधुबन की आस लिए
है याद तुझे वो दिन जब तूने
गीत नया कोई गाया था
यूँ लगा था तुझको साथ तेरे
किसी और ने भी दोहराया था
आज कहाँ संगीत है वो
वो साज़ कहाँ जो अपना था
आँखें कहती है साथ तेरे
पर मन कहता वो सपना था
राख लिए उस सपने की
तू दूर कहाँ तक जाएगा
मुढ़कर पीछे जब देखेगा
खुद को ही बिखरा पायेगा
है किसे खबर जीवन पथ पर
तुझे भय लगता है मुढ़ने में
किसको पता तुझे दर्द है होता
टूट के फिर से जुड़ने में
तेरी बोझिल आँखें कहती है
अब सपना देख न पाएगा
रिक्त मगर अनुरागों से भी
तुझसे रहा न जाएगा
है यूँही जटिल ये जीवन कुछ
नहीं आएगा तुझे रास प्रिये
तूने महल बनाया पत्थर का
मन में मधुबन की आस लिए
फिर भरी एक राज सभा में
चीर-हरण करवाओगे
हर आँख में दुःशाशन है मन
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे
वो बात युगों पहले की थी
जब तुम पर आँख उठाई थी
दे अपनी छाती का लहू
उसने कीमत चुकाई थी
आज अलग दुनिया है कुछ
तुम अब नहीं बच पाओगे
हर आँख में दुःशाशन है मन
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे
वो कालिख लेकर हाथों में
रोज़ तुम्ही पर फेकेंगे
ये दृष्टिवान् ध्रितराष्ट्र सभी
भर आँख तमाशा देखेंगे
सदियों पहले के किस्से को
तुम कैसे अब दोहराओगे
हर आँख में दुःशाशन है मन
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे
तड़प लो चाहे कितना भी
वो तरस कभी ना खाएंगे
निज-कुत्सितता की अग्नि से
हर रोज़ तुम्हे जलाएंगे
व्यर्थ अनल में जाएगा
तुम जितना नीर बहाओगे
हर आँख में दुःशाशन है मन
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे
ये महाभारत इस युग की है
जहाँ कंस ध्वजा लहराएंगे
लाख दुहाई दोगे तुम
पर मधुसूदन नहीं आएंगे
इस ह्रदय-हीन सभा में कैसे
अपनी लाज बचाओगे
हर आँख में दुःशाशन है मन
तुम कृष्ण कहाँ से लाओगे
कभी जज़्बात की आँधी
कभी हसरत की बरसातें
मन को जूझना होगा
कि है निर्मम यहाँ रातें
किसी के पास सब कुछ है
कोई हर पल तरसता है
कहीं आँखों में सपने है
कहीं सावन बरसता है
कोई तो रास्ता होगा
जहाँ से वक़्त गुज़रता हो
होगा कोई गाँव ऐसा
जहाँ कुछ पल ठहरता हो
ये नदी है जीवन की
है इसकी धार में बहना
बह जाओ तो बेघर हो
वर्ना प्यासे रहना
न कोई चाह है फिर भी
बड़ी तीखी उदासी है
जो नींदों से जगाता हो
ये कैसी बदहवासी है
नहीं है ख़्वाब ये कोई
ये मेरी ही कहानी है
एक अधूरे मन की ये
अधूरी सी निशानी है
उड़ा लो अपने बादल को
मुझे धूप झुलसता सहने दो
मेरा मन का घरौंदा है काफी
मुझे अपनी धुन में रहने दो
गूंजती है दीवारों में
हर दर्द के आहट की कंपन
हर साँस ठहर सी जाती है
जब नींव में होता है स्पंदन
है रुष्ट अगर घर मुझसे तो
उसे यूँ उखड़ा ही रहने दो
मेरा मन का घरौंदा है काफी
मुझे अपनी धुन में रहने दो
इस निर्धन मन का ग्रास यही
दो आँखें पूरा करती है
है विचित्र यह गागर जो
बस चक्षुजल से भरती है
है अश्रु नहीं ये जीवन है
जो बहता है तो बहने दो
मेरा मन का घरौंदा है काफी
मुझे अपनी धुन में रहने दो
दर्द है अश्क़ है लाचारी है
तेरी दुनिया का हर शक्स एक भिखारी है
दिया था तूने जिसे सबको ज़िन्दगी कह कर
दुखता सीने में अब तलक वही बीमारी है
किस रात की सियाही से लिखा था तूने
मेरी किस्मत को सिर्फ ग़म से सरोकारी है
यह धुँए का है जलन या है कोई और चुभन
फिर आँखों से निकली तेरी सवारी है
कोई रहम न कर इतना तो बता मुझको मगर
क्या मेरी रूह का होना मेरी लाचारी है
कैसे सम्भलूँ कि गिराया मुझे जब तूने ही
क्या इसमें भी तेरी कोई मदद्गारी है
हो जो भी मगर है नहीं शिक़वा तुझसे
है सुकूँ यही हर जंग तुझही से हारी है
ख्वाबों के टुकड़े है हक़ीक़त के सिरहाने में
छूट सा जाता है कुछ हर पल के बीत जाने में
क्या कहूँ किस बात से हूँ बिखरा बिखरा
उम्र बीती है मेरी खुद को समझ पाने में
आज फिर से कई उंगलियां उठी होंगी
जो दुआ दी है मैंने दिल से इस ज़माने में
वो समझते रहे ये भीड़ मेरे जश्न की है
मै भटकता ही रहा शहर के वीराने में
कोई और भी रोता है कुछ मेरी ही तरह
आज मालूम हुआ देखा जो इस आईने में
कोई रिश्ता तो होगा दिल का अंधेरों से
वार्ना कुछ ख़ास नहीं है दिया जलाने में
हर एक लफ्ज़ को अपने से कोई रंग ना दो
कुछ भी नहीं बस दर्द है अफ़साने में